उपवासी कलाकार

Posted: June 20, 2010 in Uncategorized

 

 

 

मृत्यु से दो साल पहले फ्रांत्स काफ्का की 1922 में प्रकाशित इस कहानी की कई व्याख्यायें हुईं हैं–मृत्यु आकांक्षा, एकाकी कलाकार, आध्यात्मिक शून्यता भी। चालीस दिन के उपवास की अधिकतम सीमा को मूसा, एलिजा और जीसस क्राइस्ट के इतनी ही अवधि के उपवास से जोड़ कर भी पढ़ा गया है। समूची बाइबिल में यह महज तीन ही अवसर हैं जब उपवास इतने दिन तक गया है। ये तो पता नहीं कि काफ्का के जेहन में यह संदर्भ था या नहीं लेकिन हाॅं उनका नायक चालीस दिन की सीमा से कहीं परे निकल जाना चाहता है। एक अमरीकी बौद्ध ने इस अनुवादक को यह भी बताया था कि यह कहानी बौद्ध धर्म की एक शाखा के मठों में रहते बौद्ध भिक्षुओं के ‘पाठ्यक्रम‘ में भी है। प्रौढ़ भिक्षु एक नवजात बौद्ध के समक्ष उपवासी कलाकार का पाठ करते हैं, उसे अपनी रूह में उतारने को प्रेरित करते हैं।
 

 

                             उपवासी कलाकार

उपवास कला में जनता की दिलचस्पी पिछले कुछ दशकों से काफी घटती जा रही है। पहले इस कला का बड़े स्तर पर सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ करता था, इन दिनों यह बिल्कुल असंभव है। समय बदल गया है। उन दिनों पूरा शहर उपवासी कलाकार की कला में रुचि लेता था,दर्शकों की भीड़ उसके उपवास के पहले दिन से ही बढ़ने लगती थी, हर इंसान कलाकार को दिन में कम अस कम एक बार तो देखना चाहता ही था। उसके उपवास के अंतिम दिनों में लोग सीजन टिकिट लेकर सलाखों वाले उसके छोटे से पिंजरे के सामने दिन भर बैठे रहते थे। लोग रात में भी उसे देखने आया करते थे, जब लपटती मशाल की आंच में उसका पिंजरा चमका करता था।

अच्छे मौसम में उसका पिंजरा खुले मैदान में ले जाया जाता था,जहाॅं बच्चों के लिये उसका विशेष प्रदर्शन होता था। बड़ों के लिये जहाॅं वह एक जोकर, मसखरे से अधिक न था जिसे चूॅकि सभी देखने आते थे वे खुद भी आ जाते थे, वहीं बच्चे विस्मय से उसे देखते रहते थे। डरे-सहमे से बच्चे एक दूसरे का हाथ थामे, देखते रहते काले कपड़ों में लिपटी उस मरियल काया को,जिसके पेट की हड्डियाॅं डरावनी तरह से उभरी रहतीं थीं,जो भूसे के ढेर में धंसकर बैठे रहने के लिये कुर्सी तक को हटा दिया करता था। जब वह दर्शकों के प्रश्नों के जवाब देता उसके होंठों पर कसक भरी मुस्कान उभर आती और उसका सिर धीमे धीमे हिलता रहता। कभी कभी वह अपनी बाॅंहें सलाखों से निकाल बाहर फैला देता कि लोग महसूस कर सकें वह कितना पतला है।

लेकिन अक्सर वह अपने में सिमटा रहता था, किसी पर ध्यान नहीं देता। उस घड़ी पर भी नहीं जो पिंजरे में रखी अकेली वस्तु थी और उसके लिये बड़ी ही महत्वपूर्ण थी। बस अधखुली आॅंखों से सामने ताकता रहता,कभी कभार छोटे से गिलास से पानी का बस इतना घॅूंट लेता कि होंठ भीग सकें।

आते जाते दर्शकों के अलावा,वहाॅं जनता द्वारा नियुक्त संतरी भी तैनात रहते थे जो, दिलचस्प है कि, अक्सर पेशे से कसाई हुआ करते थे। उनकी तीन शिफ्ट में ड्यूटी हुआ करती थी और वे दिन-रात उपवासी कलाकार पर नजर रखते थे कि कहीं वह बेईमानी से चोर छुपा कर कुछ खा न ले। यद्यपि यह जनता को पुर्नआश्वस्त करने के लिये महज औपचारिकता ही थी। सभी जानते थे अपने उपवास के दौरान वह कलाकार किसी भी सूरत में, यहाॅं तक कि दवाब या धमकी में आकर भी कुछ नहीं खायेगा आखिर यह उसकी कला की गरिमा के विरुद्ध जो था।

हालाॅंकि सभी  संतरी इसे नहीं समझ पाते थे और कभी कभी रात की पाली में ढिलाई दे देते, सोचते कि उस कलाकार ने खाने की कोई चीज चोरी से जुगाड़ कर ली होगी। और जानबूझकर किसी कोने में सरक जाते,ताश खेलने लगते ताकि उपवासी कलाकार कुछ खा सके।
यह शक उपवासी कलाकार को भीतर से तोड़ देता था। उसके लिये इससे बड़ी प्रताड़ना और कुछ न थी। वे उसका जीवन नर्क बना देते थे, उसके लिये उपवास दुष्कर हो जाता था। कभी कभी वह रातों में अपनी कमजोरी भुला गाना शुरु कर देता, देर रात तक गाता रहता कि संतरियों को जता सके उनका शक कितना गलत था। लेकिन इसका कोई असर न पड़ता। वे उसकी मक्कारी की तारीफ करते कि वह गाना गाते हुये भी खाना खा सकता है।

इसलिये कलाकार को सलाखों के नजदीक बैठने वाले संतरी पसंद थे जो सभागृह की मद्धिम रोशनी अपर्याप्त मान, मैनेजर द्वारा दी हाई बीम टाॅर्च रात भर उस पर कौंधियाते रहते थे। तेज रोशनी से कलाकार को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह तो वैसे भी सो नहीं पाता था। रोशनी,भीड़,शोरगुल में जरा सा उॅंघ भर लेता था। ऐसे चैकीदारों के साथ वह पूरी रात जागने को हमेशा तैयार रहता। उन्हें चुटकुले और अपनी ढेर सारी यात्राओं के किस्से सुनाता और उनकी कहानियाॅं भी सुनता रहता। सिर्फ इसलिये कि वे जागते रहें और वह उनके सामने निरंतर यह साबित करता जाये कि उसके पिंजरे में खाने को कुछ भी नहीं है और जिस तरह वह कई दिनों तक भूखा रह सकता है वैसा कोई भी नहीं कर सकता।

उसके लिये सबसे अच्छा समय सुबह का होता था, जब उसके खर्चे पर मॅंहगा नाश्ता मंगाया जाता था जिस पर संतरी टूट कर पड़ते मानो रात भर की कड़ी मेहनत के बाद भूख से छटपटा रहे हांे। हांलांकि कुछ संतरी यह भी मानते थे कि इस नाश्ते के जरिये उपवासी कलाकार उन्हें फुसलाया करता था ताकि वे अपनी पाली में ढील दे दें और वह थोड़ा सा खा सके। परंतु यह बिलावजह का शक था। क्योंकि जब भी संतरियों से पूछा जाता कि अगर उनको नाश्ता नहीं मिले तो क्या वे रात की पाली में आना चाहेंगे तो वे काम तो तुरंत छोड़ चले जाते थे, लेकिन हाॅं, फिर भी संदेह करना नहीं छोड़ते थे।

दरअसल यह और ऐसे अन्य शक इस उपवास का अभिन्न अंग थे। किसी के बस में नहीं था उपवासी कलाकार पर चैबीस घंटे नजर रख सके। सही मायनों में कलाकार के अलावा कोई पक्के तौर पर नहीं जान सकता था कि उसका उपवास अनवरत व अक्षुण्ण रहा आया है या नहीं और इसलिये सिर्फ वह ही अपने उपवास का एकमात्र साक्षी था, सिर्फ वह ही उपवास की गरिमा से संतुष्ट या असंतुष्ट हो सकता था।

लेकिन एक वजह से कलाकार कभी भी संतुष्ट नहीं हो पाता था–वह इतना मरियल हो गया था कि बहुत से लोग उसकी डरावनी काया को देखने तक में सहम जाते थे और उसकी कला के प्रदर्शन को देखने नहीं आ पाते थे। लेकिन यह भी हो सकता था कि वह इतना मरगिल्ला अपने भूखे रहे आने की वजह से नहीं हुआ हो कि उसकी इस हालत की वजह अपने आप से घनघोर असंतुष्टि रही हो। क्योंकि सिर्फ उसे ही पता था, उसके करीबी लोग तक नहीं जानते थे, उसके लिये उपवास कितना आसान था। यह उसके लिये दुनिया का सबसे आसान काम था। वह इसके बारे में लोगों को बताता भी था लेकिन वे उस पर भरोसा नहीं करते थे। उसके दावे को कभी-कभी उसकी विनम्रता और अक्सर सस्ती लोकप्रियता बटोरने का जरिया बताया करते थे। कुछ लोग उसे बेईमान भी कहा करते थे जिसके लिये उपवास बहुत आसान इसलिये था क्योंकि उसने इसका एक आसान तरीका चुपके से खोज निकाला था लेकिन इसके बावजूद इसे आसान कहने की टुच्ची हिमाकत करता था।

यह सब उसे सहना पड़ता था। असल में वह इन कटाक्षों का आदी हो गया था। लेकिन कहीं भीतर निराशा का कीड़ा उसकी रूह को कुलबुलाता रहता था। उपवास पूरा होने के बाद अपना पिंजरा उसने एक भी बार स्वेच्छा से नहीं छोड़ा था। मैनेजर ने उपवास के लिये चालीस दिनों का अधिकतम समय तय कर रखा था और उपवास को कभी भी उसके आगे नहीं जाने देता था। बड़े शहरों तक में नहीं। उसने अनुभव से यह जान लिया था कि विज्ञापन दे देकर अधिकाधिक चालीस दिनों ही तक उपवास कला में दर्शकों की दिलचस्पी जगाई जा सकती थी; उसके बाद लोकप्रियता गिरने लगती थी, दर्शकों की भीड़ कम होने लगती थी। किसी-किसी शहर या देश में कुछ मामूली अंतर हो सकता था लेकिन चालीस दिन अमूमन अधिकतम समय सीमा मानी जाती थी। और चालीसवें दिन, जब उत्साही दर्शक मैदान में इकठ्ा होने लगते थे, पिंजरे को घेर लेते थे,सेना का बैंड बजाया जाता। फूलमालाओं से लदे पिंजरे को खोला जाता। दो डाॅक्टर उपवासी कलाकार का परीक्षण करने अंदर जाते। लाउडस्पीकर पर दर्शकों को परिणाम घोषित किया जाता और दो संुदर लड़कियाॅं कलाकार को सहारा देकर पिंजरे से बाहर लातीं, सीढ़ियों से नीचे उतारतीं, नजदीक सजी खाने की मेज तक ले जातीं, जिस पर आहार के कड़े नियमानुसार खाने की चीजें सजी रहती थीं।

ठीक इसी बिंदु पर, कलाकार हमेशा प्रतिवाद किया करता था। जैसे ही लड़कियाॅं उसकी ओर आतीं, वह अपनी सूखी बाॅंहें लड़कियों के सहायता को फैले हाथों में तो दे देता लेकिन खड़े होने से इंकार कर देता–आखिर चालीस दिन बाद अब क्यों रोकते हो?
आखिर जब वह और अधिक समय तक उपवास किये जा सकता था–अनंत तक; तब अभी से ही उसे क्यों रोका जा रहा है जब वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर ही रहा है? नहीं नहीं, सर्वश्रेष्ठ पर तो अभी वह पहॅंुचा नहीं है–वे उसे और अधिक दिनों तक भूखा रहे आने की गरिमा से क्यों वंचित करना चाहते हैं? सर्वकालिक महानतम उपवासी कलाकार होना भर नहीं, यह महिमा तो वह संभवतः हासिल कर ही चुका था; वह तो अपने ही द्वारा रचे प्रतिमानों को पार कर अनछुई उॅंचाईयों तक पहुॅंचना चाहता था क्योंकि उसका दृढ़ विश्वास था कि उसमें भूखा रहे आने की अप्रतिम क्षमता है।
ये दर्शक जो उसकी इतनी प्रशंसा करते थे, उसके कर्म को ले इतने अधीर क्यों थे? अगर वह उपवास किये जा सकता था तो वे इसके लिये तैयार क्यों नहीं थे?
और इसलिये वह थका-थका सा भी महसूस करता था। पिंजरे के भूसे में बैठे रहना उसके लिये कहीं आरामदायक था जबकि दर्शक अपेक्षा करते थे कि वह जैसे तैसे उठ कर आये और खाना खा ले। खाना — जिसके ख्याल भर ही से उसे मितली आने लगतीं थीं और वह अपनी घबराहट उन लड़कियों के वहाॅं होने की वजह से जैसे तैसे रोक भर पाता था। वह उन लड़कियों की आॅंखों में देखता जो भले ही करूणामयी सी लगती थीं लेकिन असलियत में निरी बेरहम थीं। वह अपनी सूकड़ी गरदन पर जैसे-तैसे अटकी भारी सी खोपड़ी सहमति की सी मुद्रा में हिला देता।

हर बार यही होता था। मैनेजर आता, बैंड के शोर में आवाज सुनाई नहीं पड़ती थीं, वह चुपचाप अपनी बांहें उपवासी कलाकार की ओर बढ़ा देता मानो देवताओं का आह्वान कर रहा हो कि वे भूसे के ढेर में सिकुड़ी बैठी अपनी इस निर्मिति को देखें..एक दयनीय शहीद…….शायद वह कलाकार कहीं न कहीं एक हुतात्मा ही था।
मैनेजर उपवासी कलाकार की सुखचिल्ली कमर बड़े अचकते हुये पकड़ता ताकि लोगों को उस जंतु का मरगिल्लापन जता सके। फिर उसे हल्का सा झिंझोड़ता, उसकी टाॅंगें और धड़ हाउबिलाउ से झूल जाते और मैनेजर उसकी काया लकड़ियों को पकड़ा देता जो अब तक मारे डर के पीली पड़ चुकी होतीं थीं।
उपवासी कलाकार चुपचाप यह सहता रहता था। उसका चेहरा छाती पर ढह आता,मानो लुढ़कता हुआ खुद ही बेवजह वहाॅं आ थम गया हो। उसकी खोखली देह किसी बड़े सा गढ़हे का भ्रम कराती थी। उसकी टाॅंगें आत्मरक्षा की सी मुद्रा में पेट में सिकुड़ जातीं, यहाॅं वहाॅं ढुलकती भी रहतीं, अपनी असली जगह ढूॅंढ़ रहीं हों शायद। और वह अपने पूरे वजन के साथ, जो भले ही बहुत अधिक नहीं था, उस लड़की पर ढह जाता। लड़की की सांसें अटकने लगतीं थीं, वह मदद के लिये चिल्लाने को हो आती, उसने नहीं ही सोचा था कि उसे यह सब भी करना पड़ेगा। जितना हो सके वह अपनी गरदन पीछे हटाने की कोशिश करती ताकि उसका चेहरा उपवासी कलाकार से न छुल पाये, लेकिन इसमें असफल रहती और यह देखकर कि दूसरी लड़की को यह नहीं झेलना पड़ा है वह तो दूर से ही हड्डियों के ढेरी से उपवासी कलाकार का हाथ जैसे तैसे पकड़े खड़ी रही आयी है,पहली लड़की आॅसुओं में फूट पड़ती, वहाॅं तैनात एक मुस्तैद प्रहरी को उसे संभालना पड़ता। उसकी हालत देख दर्शक ठहाका मार कर हॅंस पड़ते।

इसके बाद खाने का समय होता था। मैनेजर बूॅंद भर खाना लगभग बेहोश हो चुके कलाकार को चम्मच से खिलाता, दर्शकों से बातें भी करता रहता ताकि किसी का ध्यान उपवासी कलाकार की बिगड़ती हालत पर न जाये। इसके बाद दर्शकों के लिये शैंपेन भी खोली जाती, जिसके लिये शायद उपवासी कलाकार ने ही मैनेजर को फुसफुसाते हुये कहा था। इस दौरान बजता बैंड हर लम्हे को पूरी मुस्तैदी से संगीत की धुनों में पिरोता जाता। फिर सभी वापस लौट लेते, इस प्रदर्शन को ले किसी के भी पास असंतुष्ट होने की कोई वजह न था,किसी के पास भी नहीं।
सिवाय उपवासी कलाकार के।

वह वर्षों से इसी तरह रहता आया था। बीच बीच में थोड़ा बहुत विश्राम और एक विलक्षण सफलता जिसके आगे सभी सर झुकाते थे। लेकिन इसके बावजूद वह अक्सर अंधियारी निराशा में डूबा रहता, जो और अधिक स्याह हो जाती जब लोग उसकी पीड़ा को जरा भी तवज्जो नहीं देते थे। कोई आखिर कैसे उसे खुश कर सकता था? वह आखिर और क्या चाहता था? जब कोई संवेदनशील व्यक्ति उस पर तरस खाकर उसे समझाने की कोशिश करता कि उसकी उदासी दरअसल उसके भूखे रहे आने की वजह से ही उपजती है,तो कभी कभी, खासकर उपवास की चरमावस्था में, वह कलाकार फुफकारता हुआ आगे बढ़ आता,पिंजरे की सलाखें किसी हिंसक जानवर की तरह खड़खड़ाने लगता, दर्शक सहम जाते।
इस तरह के जंगली और असभ्य व्यवहार पर मैनेजर ने एक खास सजा तय कर रखी थी,जिसे लागू करने से वह जरा भी नहीं हिचकता था। वह उपवासी कलाकार की ओर से दर्शकों से माफी माॅंगता कि उसका यह जंगलीपना लंबे समय तक भूखा रहे आने का परिणाम है जो किसी पेट भरे संतुष्ट इंसान को भले ही समझ नहीं आये लेकिन इसके लिये उन्हें कलाकार को माफ कर देना चाहिये। फिर मैनेजर कलाकार के दावे को भी बताता कि वह कई दिनों तक भूखा रहा आ सकता है और उसकी उच्च आकांक्षा, महान इरादों व उस दावे में अंतर्निहित आत्मतर्पण की भी तारीफ करता। लेकिन इसके बाद वह कुछ तस्वीरें भी दिखाकर बड़ी सहजता से उस दावे को झुठला भी देता। यह तस्वीरें नजदीक ही बिक्री के लिये रखी होतीं थीं जिनमें वह कलाकार उपवास के चालीसवें दिन भूख के मारे बिस्तर पर ढेर, लगभग मुर्दा पड़ा होता था।

भले ही सच्चाई को यों विकृत कर दिखाया जाना कलाकार के लिये नयी बात नहीं थी लेकिन फिर भी वह हर बार इससे झुंझला उठता था –जो उसके उपवास को असमय खत्म कर दिये जाने का प्रभाव था उसे कारण की तरह बताया जा रहा था! इस तरह की मक्कारी से नहीं ही निपटा जा सकता था, यह उसकी रूह को लहूलुहान छोड़ जाती थी। वह पिंजरे की सलाखें पकड़े गौर से सुनता रहता था कि मैनेजर क्या कह रहा था लेकिन जैसे ही तस्वीरों को दिखाया जाता उसकी पकड़ ढीली पड़ती जाती और वह एक गहरी आह भर भूसे के ढेर में ढह जाता। दर्शक आगे बढ़ उसकी ढह चुकी काया देखते, मैनेजर की बात पर उनका यकीन पुख्ता हो जाता।

इन घटनाओं के गवाह कुछेक साल बाद जब मुड़कर उन दृश्यों को याद करने पर चैंक जाने वाले थे। क्योंकि अचानक से बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। यह लगभग रातों रात हुआ था। इसकी कई वजह हो सकतीं थीं लेकिन उन्हें जानने में किसी की कोई दिलचस्पी न थी। अब तक आकर्षण और प्रशंसा का केंद्र बने रहे उपवासी कलाकार ने सहसा पाया था कि वे दर्शक जो उसके करतब देखने उमड़ आया करते थे सहसा दूसरी चीजों की ओर मुड़ने लगे थे। उसका मैनेजर उसे ले यूरोप का चक्कर लगा आया था कि उपवास कला में दर्शकों की दिलचस्पी अभी भी है या नहीं। लेकिन इससे कुछ न हुआ था। उपवास कला के प्रति उब और अरुचि एक झटके से पूरे में फैलती गयी थी मानो सभी दर्शकों ने आपस में तय करके यह फैसला किया हो।

लेकिन फिर यह भी सही है कि यह एकदम ही अप्रत्याशित न था। पिछले दिनों को अगर याद किया जाये तो कई सारे ऐसे लक्षण दिखने लगे थे जिन्हें उपवासी कलाकार की सफलता के जुनून में अनदेखा किया जाता रहा था और इसीलिये उनसे निबटने के लिये कुछ नहीं किया गया था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। सही था कि अन्य चीजों की तरह उपवास कला भी एक न एक दिन फिर से प्रचलन में आ ही जाती, लेकिन यह ख्याल उपवासी कलाकार को कोई सांत्वना नहीं देता था। और फिर तब तक वह आखिर क्या करता? वह इंसान जिसकी कला को हजारों दर्शकों ने सराहा हो, गाॅंव देहात के छोटे मेलों में आखिर कैसे छुटकल्ले करतब दिखाता ? और फिर जहाॅं तक कोई दूसरा कर्म अपनाने का प्रश्न था न सिर्फ उस कलाकार की उम्र अधिक हो चुकी थी बल्कि उपवास कर्म के लिये उसमें उन्मादी प्रतिबद्धता भी थी। और इसलिये उसने अपने तत्कालीन मैनेजेर और कंपनी को छोड़ कर एक बड़े सर्कस से अनुबंध कर लिया और नया काम मिलने की जल्दबाजी में अनुबंध की शर्तें तक नहीं पढ़ीं।  

एक बड़े से सर्कस में जहाॅं ढेर सारे कलाकार, जानवर व उपकरण हों, तरह-तरह के प्रदर्शन होते रहते हों, वहाॅं किसी को कभी भी, उपवासी कलाकार को भी, जिसकी तो जरूरतें वैसे भी बहुत अधिक न थीं, काम मिल सकता था। और फिर यहाॅं तो यह भी था कि कलाकार ही नहीं उसकी लंबी ख्याति भी सर्कस के साथ जुड़ रही थी। वैसे यह उसकी कला की विशेषता ही थी कि फनकार की क्षमता उम्र के साथ घटती नहीं थी। कोई नहीं कह सकता था कि वह अपने अच्छे दिनों को पीछे छोड़ आया एक सेवानिवृत्त कलाकार है जो किसी सर्कस के एक बेगार से काम में शरण ले रहा है। सच ये था कि उपवासी कलाकार ने घोषणा कर दी थी–और कोई उस पर अविश्वास कर ही नहीं सकता था–कि वह पहले की ही तरह उपवास कर रहा है। उसने यह दावा भी कर दिया था कि अगर उसे अपनी इच्छानुसार काम करने दिया जाये–और सबने बेहिचक यह वायदा भी कर दिया था–तो एक दिन आयेगा जब वह दुनिया को अपनी विलक्षण कला दिखला हतप्रभ कर देगा। हाॅं अपने उत्साह में वह यह अनदेखा कर देता था कि उस समय के मिजाज को देखते हुये उसकी इन बातों पर पर विशेषज्ञ महज मुस्कुरा कर रह जाते थे।

परंतु भीतर ही कहीं उपवासी कलाकर भी यह समझता था कि उसे और उसके करतब को सर्कस में बहुत थोड़ी ही जगह मिली थी। भले ही उसके पिंजरे के चारों ओर उपवास की घोषणा वाले बड़े-बड़े साइनबोर्ड लगा दिये गये थे, लेकिन बजाय रिंग के बीच में रखने के पिंजरे को अस्तबल के नजदीक टिका दिया गया था।
मध्यांतर के दौरान दर्शक जब सर्कस से बाहर निकल जानवरों को देखने अस्तबल की ओर आते तो अक्सर ही पिंजरे के करीब से गुजरते हुये ठिठक जाते। अगर वह रस्ता संकरा नहीं होता तो वे शायद कुछ देर और वहीं ठहर कर कलाकार को देखते रह सकते थे। लेकिन पीछे से आती भीड़ को वहाॅं खड़े रहने में कोई दिलचस्पी न थी, वह जल्दी से रिंग तक पहुॅंचना चाहती थी, वहाॅं खड़े लोगों को हटाने के लिये धक्कामुक्की करती, दर्शकों को आगे बढ़ना पड़ता और वे कलाकार को देर तक, निगाह भर नहीं देख पाते थे।

इसीलिये अगर वह कलाकार एक ओर दर्शकों का बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करता था क्योंकि उनकी उपस्थिति आखिर उसके अस्तित्व को अर्थ दे पाती थी तो वहीं वह उन्हें देखकर सहम भी जाता था। शुरुआत में वह बड़ी बेकरारी से मध्यांतर का इंतजार करता था, बढ़ती आती भीड़ को
देख उत्साहित हो जाया करता था लेकिन बहुत जल्दी ही वह निराशा में डूबने लगा था। वह भले ही अपने को एक जिद्दी छलावे में रखे था लेकिन अनुभव ने जल्दी ही उसे सिखा दिया था कि भीड़ के लिये वह महज अस्तबल तक आने वाला एक रास्ता भर था और इसलिये वे लोग उसे तभी तक सुहाते थे जब वे उसे दूर से दिखायी देते थे। जैसे ही वे नजदीक आते, उसके कान बनती-बिखरती भीड़ के दो समूहों से आती चीख पुकार और फटकार से फट पड़ते थे। वे जो सिर्फ अस्तबल में कैद जानवरों को ही देखने के लिये वहाॅं आते थे और दूसरे वे जो उसे ठहर कर तो देखते लेकिन उनकी निगाहों में उसके कर्म के प्रति लगाव के बजाय उचटती हुई क्रूरता और ठंडी सनक होती– जाहिरी तौर पर ये उसे कहीं अधिक अपमानित छोड़ जाते थे।
भीड़ के छंट जाने के बाद पीछे रह गये कुछेक लोग आते थे और हाॅलांकि उन्हें वहाॅ देर तक खड़े रहने से कोई रोकता न था लेकिन वे बगल में रखे पिंजरे की ओर झांके बिना तेजी से निकलते जाते थे ताकि जानवरों को देख सकें। हाॅं, ऐसा कभी-कभार ही होता था जब कोई व्यक्ति, मसलन एक पिता अपने बच्चों के साथ वहाॅं से निकलते में उपवासी कलाकार की ओर इंगित करता, विस्तार से समझाता कि आखिर यह होता क्या है और ऐसे लेकिन इससे कहीं उत्कृष्ट प्रदर्शनों के बारे में बताता जो उसने कई साल पहले देखे थे। नादान, मासूम बच्चे देर तक खड़े रहते, समझने की कोशिश करते कि आखिर उपवास कला होती क्या है। और तभी उनकी प्रश्नाकुल निगाहों के सामने आने वाले बेहतर समय की एक
झलक कौंध जाती–क्या उपवास कला का सुनहरा भविष्य फिर से लौटने वाला था?

शायद यह सच था। उपवासी कलाकार कभी कभी अपने से कहा करता था कि चीजें कहीं बेहतर होतीं, अगर उसका पिंजरा अस्तबल के इतना नजदीक न होता तो शायद वह दर्शकों की उपेक्षा न झेलता होता। अस्तबल से आती चिर्रांध, रात भर गुर्राते जानवर, उनके लिये ले जाये जाते कच्चे मांस के लोथड़े और खाना डकारते समय की चिंघाड– ये सारी चीजें खुद कलाकार के लिये असहनीय हुआ करती थीं, उसे रत्ती भर भी चैन से नहीं रहने देतीं थीं। लेकिन इसके बावजूद वह सर्कस के मालिक से शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पाता था। क्योंकि आखिर इन जानवरों की वजह से ही तो इतने सारे दर्शक वहाॅं से गुजर पाते थे कि हो सकता था इन्हीं में से कोई सिर्फ उसे देखने के लिये वहाॅं आया होता। फिर यह भी तय नहीं था कि अगर वह मैनेजर को अपनी स्थिति के बारे में बताता तो न जाने उसे किस भूले-अंधेरे कोने में पटक दिया जाता। आखिर में वह अस्तबल के रास्ते में पड़ी एक अड़चन से अधिक न था।

एक गैर-जरूरी बाधा जो समय के साथ और भी क्षुद्र व अनुल्लेखनीय होती जा रही थी। लोग किसी उपवासी कलाकार जैसी चीज के दावों के आदी होते गये थे और इसी के साथ उसकी नियति तय होती जा रही थी। भले ही वह उपवास किये जा सकता था–आखिर सिर्फ वही तो इस कला में निपुण था– लेकिन अब उसे कोई बचा नहीं सकता था। लोग उसे अनदेखा करते निकलते जाते थे। आप चाहे कितना ही किसी को उपवास कला समझाने की कोशिश कीजिये, लेकिन जब तक उसने इसे महसूस न किया हो वह इसे समझ नहीं सकता था। साइनबोर्ड, जो कभी चमकते रहा करते थे, गंदले हो चले थे, उनके अक्षर पढ़े नहीं जाते थे, चिटखने भी लगे थे लेकिन किसी ने उन्हें बदलने की नहीं सोची थी। वह छोटी तख्ती जिस पर उपवास के दिनों का हिसाब रखा जाता था, जिस पर शुरुआत में बड़ी ही मेहनत से तारीखें बदली जातीं थीं, एक लंबे अर्से से अब वही पुराने आंकड़े दिखा रही थी क्योंकि कुछ ही हफ्तों बाद यह छोटा सा काम भी कर्मचारियों के लिये एक इल्लत बन गया था। और इसलिये भले ही अपनी पगलाई आकांक्षा का पीछा करते-करते वह कलाकार भूखा रहे जाता था और बड़ी आसानी से उपवास की अनछुई उॅंचाईयों को हासिल भी किये जा रहा था जिनका उसने कभी दावा किया था, लेकिन चूॅंकि कोई उपवास के दिनों को नहीं ही गिन रहा था इसलिये कोई भी, खुद उपवासी कलाकार भी नहीं, उसकी उपलब्धियों को नहीं समझ पाता था। इसी वजह से उसका दिल डूबता जाता था।
जब कभी कोई गुजरता इंसान पिंजरे के सामने ठिठक जाता, उस कृशकाय जीव का मजाक उड़ाता और उस पर बेइमानी का आरोप भी लगाता तो इससे बड़ा बेहूदा झूठ कुछ नहीं हो सकता था जो घनघोर उपेक्षा और दुर्भाव से ही उपज सकता था क्योंकि धोखा उपवासी कलाकार ने नहीं किया था वह तो पूरी निष्ठा से अपना कर्म कर रहा था, वो तो इस दुनिया ने फरेब से उससे उसकी गरिमा छीन ली थी।

कई दिन बीतते गये और एक दिन अंत भी आ ही गया। एक दिन मैनेजर ने उस पिंजरे को वहाॅं देख कर्मचारियों से पूछा कि इतना अच्छा पिंजरा आखिर क्यों भूसे से भरा, बेकार पड़ा है। लेकिन कोई भी इसका जवाब नहीं दे पाया और तब एक कर्मचारी की निगाह दिनों का हिसाब रखती उस तख्ती पर पड़ी थी और उसकी स्मृति अचानक कुलबुला पड़ी। उन्होंने डंडियों से भूसे को उल्टा पल्टा जिसके नीचे उपवासी कलाकार दबा पड़ा था। 
‘तुम अभी भी उपवास रखे हो भाई?‘ मैनेजर ने पूछा,‘ क्या तुम अपना ये करतब कभी खत्म नहीं करोगे?‘
‘कृपया..मुझे माफ कर दीजिये।‘ कलाकार उन सभी को संबोधित कर फुसफुसाया हाॅंलाॅंकि सिर्फ पहरेदार ही, जिसके कान सलाखों से सटे थे, इसे सुन पाया। ‘जरूर।‘ मैनेजर ने एक उंगली अपनी कनपटी पर रख कहा मानो अपने साथियों को यह इशारा कर रहा हो कि उपवासी कलाकार किस मनोस्थिति में जी रहा था। ‘विश्वास मानो हमने तुम्हें माफ कर दिया है।‘ ‘मैं सिर्फ इतना चाहता था कि आप लोग मेरे उपवास की प्रशंसा करें।‘ कलाकार बोला। ‘वो तो हम करते ही हैं।‘ मैनेजर ने विनम्रता से कहा। ‘लेकिन आपको इसकी तारीफ नहीं करनी चाहिये।‘ उपवासी कलाकार ने कहा। ‘अच्छा..चलो ठीक है, नहीं करते हम तारीफ,‘ मैनेजर बोला,‘ लेकिन क्यों नहीं करनी चाहिये हमें तारीफ?‘ ‘क्योंकि मुझे तो उपवास करना ही है, मैं इसके बगैर नहीं रह सकता।‘ उपवासी कलाकार बोला। ‘तुम्हारी बकवास मुझे समझ नहीं आ रही है,‘मैनेजर ने कहा,‘ तुम भूखे रहे बगैर क्यों नहीं रह सकते?‘
‘क्योंकि….,‘ उपवासी कलाकार ने बोलना शुरु किया। सिर को थोड़ा सा उठाया, उसके होंठ मानो चूमने की मुद्रा मे भिंच गये थे और वह मैनेजर के कान में धीमे से फुसफुसाया कि कहीं कोई शब्द हवा मे खो न जाये,‘…क्योंकि मुझे कभी भी अपनी पंसद का भोजन नहीं मिल पाया, विश्वास मानिये अगर मुझ वह मिल जाता तो मैं कभी भी ये झमेला खड़ा नहीं करता और आप सबकी तरह अपना पेट भर लिया करता।‘
यह उसके अंतिम शब्द थे और उसकी छितरायी निगाहों में अभिमान की चमक न सही यह दृढ़ विश्वास अभी भी शेष था कि वह अभी भी उपवास किये जा रहा था।
‘खेल खत्म। चलो ये कूड़ा साफ कर दो।‘ मैनेजर बोला और सभी ने उपवासी कलाकार को उस भूसे के साथ ही दफना दिया। उस पिंजरे में अब एक मांसल तेंदुआ रख दिया गया था। किसी निरे भावशून्य इंसान के लिये भी यह बड़ी ही राहत की बात थी कि उस पिंजरे में जो कुछ समय पहले तक एकदम निर्जीव सा पड़ा था, अब एक दुर्दम्य जानवर दहाड़ता था। इस जानवर के पास सबकुछ था। कर्मचारी उसकी पसंद का खाना उसे तुरंत दे दिया करते थे। और ऐसा भी नहीं लगता था कि उसकी आजादी छीनी जा चुकी थी। लगता था उसकी उन्मुक्त, मांसल देह जो उफन-उफन कर बिखर रही थी, अपनी आजादी अपने साथ, शायद अपने खंूखार जबड़ों में लिये घूम रही थी। धड़कते जिंदा यौवन के इस उल्लास का जुनून उस नरभक्षी की फुंकार से ऐसे अंगारे बरसा देता था कि दर्शकों को उसके सामने खड़े रहने में डर लगा करता था। लेकिन फिर भी वे हिम्मत कर, पिंजरे के चारों ओर सिमट आते थे और एक बार वहाॅं आकर फिर हटते नहीं थे।

 

 

 

 

 

 

 

 

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Comments
  1. Giriraj K says:

    brilliant! yours i suppose.

  2. Haan…mera hi anuvaad hai.

  3. Sonu says:

    आशुतोषजी,
    मैंने मार्च-2010 की कथादेश में देखा कि उसका “गल्प” विशेषांक आने वाला है, जिसके संपादक आप हैं। आपसे अनुरोध है कि अपने ‘ब्लॉगर प्रोफ़ाइल’ पर अपने बारे में कुछ जानकारी दें।

    क्या आपने कभी जर्मन भाषा सीखने का विचार किया है?

    उच्चारण के क्रम में टाइप किया कीजिए।

    उ और ऊ अलग वर्ण हैं। यूनिकोड में इन्हें अलग-अलग मान दिया गया है। चंद्रबिंदु एक मात्रा है। ऑ के ऊपर अनुस्वार लगाना ग़लत है।

    ख़ूँख़ार=ख+़+ू+ँ+ख+़+ा+र

    अपवाद यह है कि क् लिखने के लिए क+् टाइप करना पड़ता है जो कि उच्चारण का क्रम नहीं है।

    टाइपिंग में और कोई दिक़्क़त भी हो तो यहीं पर बताइएगा।

    July 19, 2010 10:54 AM

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